किसान · फौजी · व्यवसायी · सरपंच · जनसेवक — एक ही आदमी के पाँच पड़ाव।
नाम: मोहन बधाला
क्षेत्र: ज़िला जयपुर, राजस्थान
पृष्ठभूमि: किसान परिवार
पूर्व सेवा: भारतीय सेना
जनप्रतिनिधित्व: पूर्व सरपंच
वर्तमान: सहकारिता एवं दुग्ध उत्पादक हित
मोहन बधाला की कहानी किसी एक दायरे में नहीं बंधती। खेत में काम भी किया, वर्दी पहनकर देश की सेवा भी की, अपना कारोबार भी अपने बूते खड़ा किया, गाँव की सरपंची भी संभाली — और आज समितियों, सचिवों और दुग्ध उत्पादकों के हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं।
हर पड़ाव ने कुछ न कुछ सिखाया, और वो सीख आज भी उनके काम में दिखती है।
खेती और पशुपालन — पहली पहचान, और आज भी वही जड़।
भारतीय सेना में सेवा — अनुशासन का पाठ वहीं से।
अपना काम खड़ा किया — किसी की सिफ़ारिश से नहीं।
गाँव ने भरोसा जताया — सीधे जनप्रतिनिधित्व की ज़िम्मेदारी।
सहकारिता में — समितियों, सचिवों और दुग्ध उत्पादकों की आवाज़।
किसान से फौजी, फौजी से सरपंच — पूरा सफ़र इस इंटरव्यू में।
इंटरव्यू — JVP Media Group
मोहन बधाला एक साधारण किसान परिवार में जन्मे। खेती और पशुपालन ही परिवार की आजीविका रही। घर में गाय-भैंस थीं, और सुबह-शाम दूध निकालना रोज़ का काम था।
इसीलिए दुग्ध उत्पादक की परेशानियाँ उन्होंने किसी रिपोर्ट में नहीं पढ़ीं — अपने घर में देखी हैं। सुबह की धार से लेकर समिति पर दूध तौलने तक, और फिर महीने के आख़िर में हिसाब का इंतज़ार — यह सब उनका भोगा हुआ है।
खेत से निकलकर वे भारतीय सेना में भर्ती हुए। गाँव के एक किसान के बेटे के लिए यह छोटी बात नहीं थी — और फौज ने उन्हें वह चीज़ दी जो आज भी उनके हर काम में दिखती है।
फौज सिखाती है कि समय पर पहुँचना ज़रूरी है, कि जो ज़िम्मा लिया वो पूरा करना है, और कि साथ खड़े आदमी को बीच में नहीं छोड़ा जाता। यही तीन बातें आज भी उनकी कार्यशैली की बुनियाद हैं।
फौजी की सोच सीधी होती है — जो कहा, वो करना है। बहाना बनाना उसे आता ही नहीं।
सेना के बाद उन्होंने अपना व्यवसाय खड़ा किया। किसी की सिफ़ारिश से नहीं, किसी बड़े सहारे से नहीं — अपनी मेहनत से, एक-एक कदम चलकर।
इसी दौर में उन्होंने नज़दीक से समझा कि छोटे कारोबारी और किसान को हर कदम पर क्या-क्या झेलना पड़ता है — कागज़ों के चक्कर, दफ़्तरों के धक्के, और अपना ही पैसा माँगने में लगने वाला वक़्त।
गाँव के लोगों ने भरोसा जताया और उन्हें सरपंच चुना। यह पहला मौका था जब जनता ने सीधे उनके हाथ में ज़िम्मेदारी दी।
सरपंची ने सिखाया कि जनप्रतिनिधि होने का मतलब कुर्सी नहीं, जवाबदेही है। गाँव का आदमी सीधे घर आकर सवाल पूछता है — और उसे जवाब देना ही पड़ता है। यही आदत आज भी है: हर शिकायत सुनना, और जो न हो सके उसके लिए साफ़ मना कर देना।
दुग्ध सहकारी समिति के काम से जुड़ने के बाद उन्होंने समझा कि यह ढाँचा कितना अहम है — और कितना उपेक्षित। दूध की दर, भुगतान में देरी, पशु आहार की क़ीमत, सचिवों का मानदेय और समितियों के चुनाव — इन सभी मुद्दों पर वे लगातार सक्रिय रहे हैं।
जिस आदमी ने खुद खेत में काम किया हो, वो जानता है कि सुबह पाँच बजे उठकर काम शुरू करने का क्या मतलब होता है। समिति का सचिव भी यही करता है — रोज़, बिना छुट्टी, बिना शिकायत। फिर भी उसके पास न ठीक मानदेय है, न कोई पहचान।
यही वजह है कि सचिवों का सम्मान उनके एजेंडे में सबसे ऊपर है।
अब एक ही लक्ष्य है — ज़िला दुग्ध संघ का काम इस तरह चले कि उसका सीधा फ़ायदा समिति के आख़िरी सदस्य तक पहुँचे। दाम सही मिले, भुगतान समय पर हो, सचिव को उसका सम्मान मिले, और हर हिसाब उत्पादक के सामने रहे।
दफ़्तर में बैठकर नहीं — समिति की बैठक में जाकर सचिवों और उत्पादकों से सीधे बात।
जो भी फ़ैसला हो, उसकी जानकारी सरल भाषा में हर समिति तक पहुँचे।
जो कहा, वो करना। हर शिकायत पर पावती और तय समय में जवाब।