दुग्ध उत्पादक किसानों और समितियों की असली मांगें — जो गाँव-गाँव जाकर, समिति-समिति सुनकर तैयार की गई हैं।
वर्तमान में दुग्ध उत्पादक किसानों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, एवं जीना भी दूभर होता जा रहा है। इसी संदर्भ में दुग्ध उत्पादक किसानों की विभिन्न मांगें हैं।
हर मांग वह है जो जयपुर दुग्ध संघ के स्तर पर सीधे तय की जा सकती है।
नवम्बर 2025 से दुग्ध उत्पादक किसानों की आरोग्य बीमा योजना ख़त्म हो चुकी है। यह योजना वर्षों से चली आ रही थी। बीमा न होने से किसान को भारी बीमारी में नगद रुपये देकर इलाज करवाना पड़ रहा है — और कई तो इलाज ही नहीं करवा पा रहे, बीमारी की पीड़ा भोगने पर मजबूर हैं।
11 दिसम्बर से दुग्ध का क्रय मूल्य 50 पैसे प्रति फैट घटा दिया गया। इस महंगाई के दौर में कोई भी वस्तु सस्ती नहीं हो रही — फिर किसान की कमर तोड़ने का काम क्यों? रेट बढ़नी चाहिए, घटनी नहीं।
समितियों ने दुग्ध परिवहन के लिए टैंकर ख़रीदे, पर वे बंद खड़े हैं। बंद टैंकर पर भी ड्राइवर का ख़र्चा, क़र्ज़ का ब्याज और मेंटेनेंस चलता रहता है — इसी वजह से कई समितियाँ भयंकर घाटे में आ गई हैं।
जीका (JICA) योजना के अंतर्गत जयपुर दुग्ध संघ को 50 नए दुग्ध टैंकर प्राप्त हुए हैं। इनका वितरण वरीयता के आधार पर समितियों को होना चाहिए — निजी टैंकरों को नहीं।
कई समितियों के पास अपना ढंग का भवन तक नहीं है। जीका (JICA) योजना में सभी समितियों को भवन निर्माण के लिए 5 लाख रुपये की राशि तुरंत उपलब्ध करवाई जाए।
दूध ख़राब होने से बचाने के लिए कूलिंग ज़रूरी है, पर मशीनें हर समिति तक नहीं पहुँचीं — और जो सरकारी योजना में आ चुकी हैं, वे भी चालू नहीं हुईं।
दुग्ध उत्पादन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है — इसे विशेष रूप से शीतकाल में न नियंत्रित किया जा सकता है, न रोका जा सकता है। जब पशु दूध देगा, तब देगा। ऐसे में खरीद पर सीमा लगाना किसान के साथ अन्याय है।
25.12.2025 के पत्र में कहा गया है कि बी.एम.सी. क्षमता का 100% ही दुग्ध संकलन किया जाए। यह आदेश ज़मीनी सच्चाई के खिलाफ़ है —
समितियों को पशु आहार पर आज भी सिर्फ़ ₹12 प्रति बैग कमीशन मिलता है — जो आज के ख़र्च के सामने कुछ भी नहीं है। साथ ही आहार ख़ुद इतना महंगा है कि किसान की लागत निकलनी मुश्किल हो जाती है।
जयपुर डेयरी की समस्त दुग्ध उत्पादक समितियों को एम.सी.यू. सेट वितरित किए जाएँ। इस वितरण में किसी भी तरह का भेदभाव न किया जाए — जो समिति छोटी है या दूर है, उसका हक़ भी उतना ही है।
समिति का सचिव ही रोज़ सुबह पाँच बजे समिति खोलता है, दूध तौलता है, फैट जाँचता है और हिसाब रखता है। वर्षों की सेवा के बाद भी उसके पास न कोई पक्का दर्जा है, न कोई सुरक्षा।
सभी समितियों को जयपुर दुग्ध संघ की सदस्यता अनिवार्य रूप से दिलवाई जाए, जिससे हर समिति को संघ के लाभ में उसका हिस्सा मिल सके। जो समिति दूध देती है, संघ के मुनाफ़े में उसका हक़ भी बनता है।
अतः अनुरोध है कि उपरोक्त समस्याओं एवं मांगों का त्वरित निस्तारण करके दुग्ध उत्पादक किसानों को आर्थिक रूप से राहत दिलवाई जाए।
मौका मिलते ही इन्हीं मांगों पर सबसे पहले काम शुरू होगा।
बीमा योजना बहाल कराने का प्रस्ताव पहले दिन। साथ-साथ हर समिति से उन किसानों की सूची, जिन्होंने बीमा बंद होने के बाद नगद इलाज करवाया — ताकि भुगतान की मांग आँकड़ों के साथ रखी जाए।
कौन सा टैंकर कहाँ, कब से बंद है और उस पर कितना ख़र्च जा रहा है — पूरी लिखित रिपोर्ट। साथ ही 10 रुपये प्रति फैट की दर का प्रस्ताव संचालक मंडल के सामने।
50 नए टैंकरों की वरीयता सूची, समिति भवन के 5 लाख की प्रक्रिया, और बी.एम.सी. मशीनों का वितरण एवं बंद मशीनों को चालू कराना — सब पारदर्शी सूची के साथ।
सचिवों के ₹50 लाख बीमा तथा पशु आहार कमीशन ₹50 प्रति बैग का प्रस्ताव। साथ ही संघ का पहला खुला हिसाब — सरल भाषा में, हर समिति तक।
आपकी समिति की कोई ज़रूरत इन ग्यारह में नहीं है, तो हमें बताइए — मांग पत्र में जोड़ी जाएगी।