जो सुबह पाँच बजे समिति खोलता है, दूध तौलता है, फैट जाँचता है, रजिस्टर भरता है और शाम को फिर वही करता है — उसका नाम कहीं नहीं आता। अब आएगा।
संघ के दफ़्तर में बैठकर कोई कितनी भी योजना बना ले, गाँव में उसे उतारने वाला एक ही आदमी होता है — समिति का सचिव।
दूध का माप, फैट की जाँच, रजिस्टर, भुगतान की पर्ची, सदस्यों की शिकायत, मशीन का रखरखाव, संघ को रिपोर्ट — सब कुछ उसी के ज़िम्मे। अगर सदस्य का दूध कम तुल जाए तो गुस्सा भी सचिव पर निकलता है, और भुगतान देर से आए तो जवाब भी सचिव को देना पड़ता है।
फिर भी आज तक न उसका ठीक मानदेय है, न कोई पहचान, न कोई दर्जा। यही बदलना है।
सचिवों की बात, अपने ही शब्दों में।
यह वीडियो अपनी समिति के व्हाट्सएप ग्रुप में भेजिए — यूट्यूब लिंक
जो लोग कहते हैं "सचिव करता ही क्या है" — उन्हें यह पढ़ना चाहिए।
सर्दी हो या बारिश, सबसे पहले पहुँचना — मशीन चालू करना, बर्तन तैयार करना।
हर सदस्य का दूध तौलना, फैट/SNF जाँचना, पर्ची देना — एक-एक करके।
हिसाब चढ़ाना, कैन भरकर गाड़ी में चढ़वाना, संघ को रिपोर्ट भेजना।
"मेरा फैट कम क्यों आया?", "भुगतान कब आएगा?", "आहार कब मिलेगा?" — सब सचिव से।
शाम का दूध — वही तौल, वही जाँच, वही रजिस्टर। फिर से पूरा चक्र।
हर सदस्य का हिसाब मिलाना, कटौती समझाना, नाराज़गी झेलना — और अपना मानदेय? इंतज़ार।
ये बातें हमने दफ़्तर में नहीं, समितियों में जाकर सुनी हैं।
जितना काम और जितने घंटे लगते हैं, उसके सामने मिलने वाली राशि कहीं नहीं ठहरती।
कई-कई महीने अटक जाता है। पूछने पर हर बार नया जवाब मिलता है।
वर्षों काम करने के बाद भी न कोई पहचान पत्र, न कोई आधिकारिक दर्जा।
दूध ख़राब हुआ, मशीन बिगड़ी या हिसाब में अंतर आया — भरपाई अक्सर सचिव को करनी पड़ती है।
नई मशीन, नया सॉफ़्टवेयर, नए नियम — सीखना ख़ुद पड़ता है, कोई सिखाने वाला नहीं।
कई समितियों में न ढंग का भवन, न बिजली की व्यवस्था, न बैठने की जगह।
बिना सुनवाई, बिना कारण बताए हटाने के मामले आम हैं। कोई सुरक्षा नहीं।
बीस-पच्चीस साल सेवा देने के बाद भी न बीमा, न कल्याण कोष, न कोई सहारा।
11 सूत्रीय मांग पत्र की मांग संख्या 10 पूरी तरह सचिवों के नाम है।
यह कोई छोटी-मोटी सुविधा की बात नहीं है। यह सचिव के पूरे जीवन की सुरक्षा का सवाल है — और यही हमारे मांग पत्र में दर्ज है।
समितियों के सचिवों को सरकारी नौकरी दी जाए। वर्षों की सेवा के बाद एक पक्का दर्जा — यही सबसे बड़ा सम्मान है।
सचिवों का जयपुर डेयरी की तरफ़ से निःशुल्क ₹50 लाख का बीमा उपलब्ध करवाया जाए — पूरा प्रीमियम संघ भरे, सचिव नहीं।
ये वे काम हैं जो संघ के स्तर पर तुरंत शुरू किए जा सकते हैं।
काम और दूध की मात्रा के आधार पर मानदेय की नई, न्यायसंगत दर का प्रस्ताव — यह सबसे पहला काम होगा।
हर महीने एक तय तारीख़ पर सीधे बैंक खाते में। देरी हो तो कारण लिखित में — बहाना नहीं।
संघ की ओर से फ़ोटो पहचान पत्र, जिस पर समिति का नाम और सेवा वर्ष दर्ज हो। पहचान भी सम्मान है।
हर साल ज़िला स्तर पर समारोह — लंबी सेवा और अच्छे काम वाले सचिवों का मंच से सम्मान।
हर तहसील से चुने गए सचिवों को प्रमाण पत्र और पुरस्कार — काम का सार्वजनिक श्रेय उन्हीं को।
मशीन संचालन, दूध गुणवत्ता, हिसाब-किताब और कंप्यूटर का प्रशिक्षण — संघ के ख़र्च पर।
₹50 लाख बीमा के साथ-साथ एक कल्याण कोष, ताकि बीमारी या मुश्किल वक़्त में परिवार अकेला न पड़े।
बिना कारण बताए और बिना सुनवाई किसी सचिव को नहीं हटाया जाएगा — स्पष्ट लिखित प्रक्रिया।
भवन की मरम्मत, बिजली, ठीक मशीन और ज़रूरी सामान — काम की जगह काम लायक़ हो।
संघ में हर महीने एक दिन सिर्फ़ सचिवों के लिए — सीधी बात, पावती संख्या और तय समय में जवाब।
सिर्फ़ भाषण नहीं — सम्मान का एक तय ढाँचा।
10, 20 और 25 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले सचिवों को प्रमाण पत्र और सम्मान राशि।
दूध की गुणवत्ता, रिकॉर्ड और सदस्य संतुष्टि के आधार पर हर तहसील से चयन।
फ़ोटो, समिति का नाम और सेवा वर्ष के साथ संघ का आधिकारिक कार्ड।
हर प्रशिक्षण के बाद प्रमाण पत्र, जो सेवा रिकॉर्ड में जुड़े।
संघ की हर बड़ी बैठक में सचिवों के प्रतिनिधि को बुलाया जाएगा।
बीमारी, दुर्घटना या मुश्किल हालात में तुरंत सहायता की व्यवस्था।
ये बातें किसी एक सचिव की नहीं — लगभग हर समिति पर यही सुनने को मिलती हैं।
बीस-बाईस साल हो गए समिति चलाते हुए। आज तक कोई कागज़ नहीं मिला जिस पर लिखा हो कि मैं इस समिति का सचिव हूँ।
सुबह पाँच बजे से रात तक काम है। मानदेय पूछो तो कहते हैं बजट नहीं है। घर कैसे चले, यह कोई नहीं पूछता।
मशीन ख़राब हुई तो अपनी जेब से ठीक करवाई। सदस्यों का दूध रुक जाता, इसलिए इंतज़ार नहीं कर सकते थे।
अपनी जानकारी दर्ज कीजिए — सम्मान योजना और प्रशिक्षण की सूचना सीधे आप तक पहुँचेगी।
आपकी जानकारी हमारे कार्यालय में दर्ज हो जाती है और साथ ही व्हाट्सएप संदेश भी तैयार हो जाता है। यह किसी तीसरे को नहीं दी जाती।
जिस दिन सचिव को उसका हक़ और सम्मान मिलेगा, उसी दिन से समिति भी मज़बूत होगी।