काम गिनती से नहीं, असर से नापा जाता है। जिस समिति का बंद पड़ा टैंकर चालू हो जाए, जिस सचिव का रुका मानदेय आ जाए, जिस उत्पादक का दूध लौटाया न जाए — वही असली उपलब्धि है।
गाँव-गाँव जाकर निःशुल्क पशु जाँच, टीकाकरण और दवा वितरण के शिविर।
बंद पड़ी दुग्ध समितियों को दोबारा शुरू कराने में सहयोग।
भुगतान में देरी के मामलों को संघ स्तर पर लगातार उठाना।
फैट/SNF माप की शिकायतों को समिति और संघ तक पहुँचाना।
क्षेत्र के किसानों को उत्पादक कंपनी से जोड़ने में भागीदारी।
उन्नत नस्ल, चारा प्रबंधन और दूध की गुणवत्ता पर जानकारी सत्र।
खेत से शुरू होकर समिति तक — हर पड़ाव ने कुछ सिखाया।
किसान परिवार में जन्म। दूध निकालना, समिति पर तौलना और हिसाब का इंतज़ार करना — यह सब अपने ही घर में देखा हुआ।
अनुशासन, समय की पाबंदी और साथी को बीच में न छोड़ने की आदत — तीनों वहीं से आईं।
सेना के बाद अपनी मेहनत से कारोबार जमाया। छोटे कारोबारी और किसान की दिक़्क़तें यहीं नज़दीक से समझीं।
पहली बार जनता ने सीधे ज़िम्मेदारी सौंपी। सीखा कि जनप्रतिनिधि होने का मतलब कुर्सी नहीं, जवाबदेही है।
दूध की दर, भुगतान, पशु आहार, सचिवों का मानदेय और समितियों के चुनाव — इन मुद्दों पर लगातार सक्रियता।
11 सूत्रीय मांग पत्र, और समितियों को बंद करने के आदेश के विरुद्ध अभियान — सचिवों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर।